जीवन सरल तभी होगा - जब आप सीख जाओ कि
क्या अपनाना है
क्या बदलना है
और क्या छोड़ना है
राहगीर
क्या अपनाना है
क्या बदलना है
और क्या छोड़ना है
राहगीर
❤17🎉1
Someone asked me : Any Regrets ?
Me : ख़ुद को बहुत ग़लत जगह खर्च कर दिया
अज्ञात
Me : ख़ुद को बहुत ग़लत जगह खर्च कर दिया
अज्ञात
❤23
मतलब निकलने के बाद
भगवान भी घर के बाहर होते है
तुम तो फिर भी इंसान हो
अज्ञात
भगवान भी घर के बाहर होते है
तुम तो फिर भी इंसान हो
अज्ञात
❤20
मुझे अकेलेपन से ख़तरा नहीं है।
मुझे उन लोगों से ख़तरा है, जो अपनेपन का नाटक करके मेरे पास आते हैं।
अज्ञात
मुझे उन लोगों से ख़तरा है, जो अपनेपन का नाटक करके मेरे पास आते हैं।
अज्ञात
❤22
दुर्योधन हर सलाह को साजिश समझता था
क्योंकि अहंकार सवाल सुन नहीं पाता
जो ख़ुद को हमेशा सही माने
उसका अंत अक्सर अकेला होता है
अज्ञात
क्योंकि अहंकार सवाल सुन नहीं पाता
जो ख़ुद को हमेशा सही माने
उसका अंत अक्सर अकेला होता है
अज्ञात
❤18
इंसान के शब्दों पर नहीं,
उसके इरादों पर गौर कीजिए
कोई डांट कर आपका भला चाहता है,
तो कोई मुस्कुरा कर जड़ काटना चाहता है
अज्ञात
उसके इरादों पर गौर कीजिए
कोई डांट कर आपका भला चाहता है,
तो कोई मुस्कुरा कर जड़ काटना चाहता है
अज्ञात
👍11❤3
मैं ज़्यादा कुछ कहूँगा नहीं। बस इतना समझ लो कि आँखें बंद रखने से सच्चाई बदल नहीं जाती। मैं चुप हूँ, इसका मतलब यह नहीं कि मैं अनजान हूँ। जो कुछ हो रहा है, वह मेरी नज़र से छुपा नहीं है। जो दोहराया जा रहा है, वह भी दिख रहा है… और जो छुपाया जा रहा है, वह भी समझ आ रहा है।
मैं अब समझाने की कोशिश नहीं करता। कुछ चीज़ें समय खुद साफ कर देता है। जो आदतें बदलनी नहीं चाहीं, वे फिर सामने आ ही जाती हैं। और जो रास्ते छोड़ने का वादा था, उन्हीं पर दोबारा चलना बहुत कुछ कह देता है। तुम्हें शायद यह अहसास अभी न हो, लेकिन वही गलतियाँ दोहराना और नए रास्तों की तलाश में पुराने ठिकानों पर लौट जाना बहुत कुछ कह देता है।
मौका मिलते ही फिर वही रास्ता चुनना,जहाँ कोई रोकने वाला न हो, इसी से तुम्हारा असली चरित्र सामने आ रहा है।
कुछ फैसले इंसान खुद करता है, और वही फैसले उसका चरित्र तय करते हैं। बार-बार उसी दिशा में लौटना, जहाँ सीमाएँ ढीली पड़ जाएँ, बहुत कुछ कह देता है
इंसान अपने शब्दों से नहीं, अपने कर्मों से पहचाना जाता है — और कर्म कभी झूठ नहीं बोलते। इंसान अपने चुनावों से पहचाना जाता है। बार-बार वही रास्ता चुनना, जहाँ रोक-टोक न हो, बहुत कुछ साफ कर देता है। जहाँ रोक-टोक न हो, वहाँ चरित्र की असली परीक्षा होती है। चरित्र वहीं दिखता है जहाँ कोई देख नहीं रहा होता — और जहाँ चरित्र कमज़ोर हो, वहाँ बहाने मजबूत हो जाते हैं।
मेरे दादा कहा करते है , “जिसके पास चरित्र नहीं, उसके पास चाहे कितनी भी कामयाबी क्यों न हो, वह भीतर से खाली ही रहता है; बिना चरित्र के मानुस की कीमत दो कौड़ी की रहती है।” उस समय यह सिर्फ बात लगती थी, आज अर्थ साफ दिखता है।
विश्वास एक बार टूट जाए तो आवाज़ नहीं करता, लेकिन उसके बाद सन्नाटा बहुत गहरा होता है, और वो सन्नाटा इस बात का गवाह होता है कि अब शायद रिश्ता फिर वैसा कभी रह नहीं पाएगा। और जो लोग सोचते हैं कि सब अनदेखा है, उन्हें अक्सर सबसे देर से पता चलता है कि उन्होंने क्या खो दिया।
इसलिए बस इतना ही कहूँगा — मानता हूँ कि शब्द तीर की तरह चुभते हैं, लेकिन तुम्हारे कर्मों के सामने वे तीर भी फीके पड़ जाते हैं। चरित्र पर लगी चोट किसी भी तीर से लगी चोट से कहीं अधिक गहरी होती है, क्योंकि तीर से लगा घाव भर जाता है, पर एक बार खोया हुआ यौवन वापस नहीं लौटता।चरित्र पर पड़ा दाग आसानी से नहीं मिटता
और हाँ — कभी यह मत समझना कि अब कौन देख रहा है। देखने वाले अक्सर बोलना बंद कर देते हैं, देखना नहीं।
— Sunil ydv SS 🍁
मैं अब समझाने की कोशिश नहीं करता। कुछ चीज़ें समय खुद साफ कर देता है। जो आदतें बदलनी नहीं चाहीं, वे फिर सामने आ ही जाती हैं। और जो रास्ते छोड़ने का वादा था, उन्हीं पर दोबारा चलना बहुत कुछ कह देता है। तुम्हें शायद यह अहसास अभी न हो, लेकिन वही गलतियाँ दोहराना और नए रास्तों की तलाश में पुराने ठिकानों पर लौट जाना बहुत कुछ कह देता है।
मौका मिलते ही फिर वही रास्ता चुनना,जहाँ कोई रोकने वाला न हो, इसी से तुम्हारा असली चरित्र सामने आ रहा है।
कुछ फैसले इंसान खुद करता है, और वही फैसले उसका चरित्र तय करते हैं। बार-बार उसी दिशा में लौटना, जहाँ सीमाएँ ढीली पड़ जाएँ, बहुत कुछ कह देता है
इंसान अपने शब्दों से नहीं, अपने कर्मों से पहचाना जाता है — और कर्म कभी झूठ नहीं बोलते। इंसान अपने चुनावों से पहचाना जाता है। बार-बार वही रास्ता चुनना, जहाँ रोक-टोक न हो, बहुत कुछ साफ कर देता है। जहाँ रोक-टोक न हो, वहाँ चरित्र की असली परीक्षा होती है। चरित्र वहीं दिखता है जहाँ कोई देख नहीं रहा होता — और जहाँ चरित्र कमज़ोर हो, वहाँ बहाने मजबूत हो जाते हैं।
मेरे दादा कहा करते है , “जिसके पास चरित्र नहीं, उसके पास चाहे कितनी भी कामयाबी क्यों न हो, वह भीतर से खाली ही रहता है; बिना चरित्र के मानुस की कीमत दो कौड़ी की रहती है।” उस समय यह सिर्फ बात लगती थी, आज अर्थ साफ दिखता है।
विश्वास एक बार टूट जाए तो आवाज़ नहीं करता, लेकिन उसके बाद सन्नाटा बहुत गहरा होता है, और वो सन्नाटा इस बात का गवाह होता है कि अब शायद रिश्ता फिर वैसा कभी रह नहीं पाएगा। और जो लोग सोचते हैं कि सब अनदेखा है, उन्हें अक्सर सबसे देर से पता चलता है कि उन्होंने क्या खो दिया।
इसलिए बस इतना ही कहूँगा — मानता हूँ कि शब्द तीर की तरह चुभते हैं, लेकिन तुम्हारे कर्मों के सामने वे तीर भी फीके पड़ जाते हैं। चरित्र पर लगी चोट किसी भी तीर से लगी चोट से कहीं अधिक गहरी होती है, क्योंकि तीर से लगा घाव भर जाता है, पर एक बार खोया हुआ यौवन वापस नहीं लौटता।चरित्र पर पड़ा दाग आसानी से नहीं मिटता
और हाँ — कभी यह मत समझना कि अब कौन देख रहा है। देखने वाले अक्सर बोलना बंद कर देते हैं, देखना नहीं।
— Sunil ydv SS 🍁
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फेर दादा बोल्या -
बेटा जो आदमी मन से उतर जा
वो ज शामी बैठा हो तो भी नज़र म कोनी आवे
बेटा जो आदमी मन से उतर जा
वो ज शामी बैठा हो तो भी नज़र म कोनी आवे
❤14
Sunil ydv SS
ये जो मैं हूँ जरा सा बाकी हूँ वो जो तुम थे वो मर गए मुझ में #SunilydvSS Join 👉 @SunilydvSS
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ये जो मैं हूँ जरा सा बाकी हूँ
वो जो तुम थे वो मर गए मुझ में
बाहर रौनक लगाए बैठे है
अंदर से श्मशान है हम
अज्ञात
वो जो तुम थे वो मर गए मुझ में
बाहर रौनक लगाए बैठे है
अंदर से श्मशान है हम
अज्ञात
❤9
अगर मेरी मौजूदगी बोझ थी
तो मेरा हट जाना ही सबसे सही फैसला है।
अब जिनसे रिश्ते मज़बूत हो रहे हैं
उन्हीं के साथ रहो —
मुझे बीच में रखने की ज़रूरत नहीं।
- Sunil ydv SS 🍁
तो मेरा हट जाना ही सबसे सही फैसला है।
अब जिनसे रिश्ते मज़बूत हो रहे हैं
उन्हीं के साथ रहो —
मुझे बीच में रखने की ज़रूरत नहीं।
- Sunil ydv SS 🍁
❤22
मैं कहूँ तो सुन लिया करो मेरी कुछ बातें,
मैं हर किसी से सब कुछ नहीं कहता
अज्ञात
मैं हर किसी से सब कुछ नहीं कहता
अज्ञात
❤12
मैं जिन लोगों के लिए पुल बन गया था
वे जब मेरे से गुज़रकर जा रहे थे
मैंने सुना मेरे बारे में कह रहे थे :
वह कहाँ छूट गया है चुप-सा आदमी
शायद पीछे लौट गया है
हमें पहले ही ख़बर थी कि उसमें दम नहीं है।
- सुरजीत पातर
वे जब मेरे से गुज़रकर जा रहे थे
मैंने सुना मेरे बारे में कह रहे थे :
वह कहाँ छूट गया है चुप-सा आदमी
शायद पीछे लौट गया है
हमें पहले ही ख़बर थी कि उसमें दम नहीं है।
- सुरजीत पातर
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